Lucknow में मोहब्बत भी तहज़ीब से की जाती है।
यहाँ लोग “आई लव यू” कम कहते हैं…
और “ख़याल रखना” ज़्यादा।
शायद इसलिए लखनऊ का इश्क़ थोड़ा अलग होता है।
धीमा… गहरा… और उम्रभर साथ रहने वाला।
नवंबर की ठंडी शाम थी।
हज़रतगंज रोशनी से जगमगा रहा था। सड़क किनारे चाय की दुकानों से उठती भाप और हल्की बारिश पूरे शहर को किसी पुराने ख़्वाब जैसा बना रही थी।
रेहान अपने कैमरे के साथ सड़क पर तस्वीरें ले रहा था।
उसे बारिश में शहरों को कैद करना पसंद था।
तभी उसकी नजर एक लड़की पर जाकर ठहर गई।
वो सड़क किनारे खड़ी बारिश देख रही थी।
सफेद चिकनकारी कुर्ता, हाथ में किताब और आँखों में अजीब सी खामोशी।
रेहान अनजाने में उसकी तस्वीर खींच बैठा।
कैमरे की आवाज़ सुनकर लड़की उसकी तरफ मुड़ी।
“बिना पूछे तस्वीर लेना बदतमीज़ी होती है।”
रेहान थोड़ा घबरा गया।
“सॉरी… लेकिन बारिश और आप… दोनों बहुत खूबसूरत लग रहे थे।”
लड़की हल्का सा मुस्कुराई।
“लखनऊ वाले हो?”
“इतना साफ पता चल गया?”
“हाँ। यहाँ के लड़के तारीफ़ भी अदब से करते हैं।”
दोनों हँस पड़े।
“वैसे मैं रेहान।”
“महिरा।”
बारिश अब थोड़ी तेज हो चुकी थी।
“चाय?” रेहान ने पूछा।
महिरा ने आसमान की तरफ देखा।
“अगर कुल्हड़ वाली हो… तो हाँ।”
दोनों पास की दुकान पर जाकर खड़े हो गए।
गर्म चाय और ठंडी बारिश का साथ… जैसे शाम को और खूबसूरत बना रहा था।
“तुम हमेशा इतनी खामोश रहती हो?” रेहान ने पूछा।
महिरा मुस्कुराई।
“और तुम हमेशा इतने सवाल पूछते हो?”
“फोटोग्राफर हूँ… लोगों को समझना पड़ता है।”
“और समझ पाए मुझे?”
रेहान कुछ सेकंड उसे देखता रहा।
“नहीं… लेकिन कोशिश करना चाहता हूँ।”
महिरा पहली बार थोड़ा खुलकर हँसी।
उस शाम के बाद दोनों अक्सर मिलने लगे।
कभी बड़ा इमामबाड़ा की गलियों में, कभी गोमती किनारे, कभी बस हज़रतगंज की भीगी सड़कों पर चलते हुए।
रेहान धीरे-धीरे महिरा की खामोशियों को पढ़ने लगा था।
वो बाहर से जितनी शांत दिखती थी… अंदर उतनी ही टूटी हुई थी।
एक रात दोनों गोमती रिवरफ्रंट पर बैठे थे। हल्की बारिश हो रही थी।
“तुम बारिश को इतना क्यों पसंद करती हो?” रेहान ने पूछा।
महिरा कुछ देर पानी को देखती रही।
फिर धीमे से बोली —
“क्योंकि बारिश में आँसू छुप जाते हैं।”
रेहान का दिल जैसे अचानक भारी हो गया।
“किसने इतना दर्द दिया?”
महिरा हल्का सा हँसी।
“कभी-कभी जिंदगी… इंसानों से ज्यादा तकलीफ देती है।”
उस रात रेहान ने पहली बार उसका हाथ पकड़ा।
धीरे से।
बिना कुछ कहे।
और शायद महिरा को पहली बार किसी का साथ सुकून लगा।
दिन गुजरते गए।
अब लखनऊ का हर कोना उनकी कहानी जानता था।
चाय वाले उन्हें देखकर मुस्कुराते, कैफ़े वाले बिना पूछे उनका ऑर्डर ले आते।
लेकिन मोहब्बत की राहें अक्सर आसान नहीं होतीं।
एक शाम महिरा बहुत चुप थी।
“क्या हुआ?” रेहान ने पूछा।
महिरा की आँखें भर आईं।
“पापा मेरी शादी तय कर रहे हैं।”
रेहान जैसे कुछ पल के लिए खाली हो गया।
“और तुम?”
“मैंने मना किया… लेकिन हर लड़ाई जीती नहीं जाती।”
बारिश अचानक तेज हो गई।
रेहान ने उसकी तरफ देखा।
“और हमारा क्या?”
महिरा मुस्कुराई… लेकिन उस मुस्कान में दर्द था।
“कुछ मोहब्बतें मुकम्मल नहीं होतीं… फिर भी सबसे खूबसूरत होती हैं।”
उस रात दोनों बहुत देर तक भीगते रहे।
बिना कुछ बोले।
क्योंकि जब दिल टूट रहा हो… तब शब्द छोटे पड़ जाते हैं।
कुछ दिनों बाद महिरा चली गई।
रेहान फिर भी हर शाम हज़रतगंज आता रहा।
उसे उम्मीद थी।
क्योंकि इश्क़-ए-लखनऊ इंतजार करना जानता है।
फिर एक रात…
वैसी ही बारिश हो रही थी।
रेहान उसी चाय वाले के पास खड़ा था।
तभी पीछे से एक आवाज़ आई —
“एक कुल्हड़ चाय मेरे लिए भी।”
रेहान धीरे-धीरे पलटा।
महिरा।
वही मुस्कान।
वही आँखें।
उसकी आँखों में नमी उतर आई।
“तुम वापस आ गई…”
महिरा हल्का सा मुस्कुराई।
“इश्क़ छोड़ना आसान होता…
लखनऊ नहीं।”
बारिश लगातार गिरती रही।
और उस रात…
लखनऊ फिर मोहब्बत से भर गया।